अमीर और गरीब देशों के बीच की दूरी को और बढ़ा सकता है एआई
लंदन। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) की एक नई रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का तेजी से बढ़ता प्रभाव भविष्य में दुनिया में अमीर और गरीब देशों के बीच की दूरी को और बढ़ा सकता है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार एआई तकनीक से मिलने वाले फायदे मुख्य रूप से विकसित और संपन्न देशों तक सीमित रह सकते हैं, जबकि दुनिया के कई हिस्सों में रहने वाले लोग इससे पीछे छूटने का खतरा झेल सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में लाखों लोग अभी भी डिजिटल कौशल, स्थिर बिजली आपूर्ति और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। ऐसे में एआई आधारित नई तकनीकों का लाभ उन्हें मिल पाना मुश्किल होगा। इससे तकनीकी विकास का फायदा केवल सीमित क्षेत्रों तक सिमट सकता है और असमानता बढ़ने की आशंका है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस स्थिति की तुलना ऐतिहासिक औद्योगिक क्रांति से की है। उस दौर में पश्चिमी देशों ने तेजी से आर्थिक और तकनीकी प्रगति की, जबकि कई अन्य देश विकास की दौड़ में पीछे रह गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई के दौर में भी कुछ वैसा ही परिदृश्य बन सकता है। अगर समावेशी नीतियां नहीं अपनाई गईं तो गरीब और विस्थापित समुदाय तकनीकी विकास की मुख्यधारा से बाहर हो सकते हैं, जिससे उनकी जरूरतें एआई सिस्टम में भी नजरअंदाज हो सकती हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्तमान में कंपनियां और संस्थान एआई के इस्तेमाल को मुख्य रूप से उत्पादकता, प्रतिस्पर्धा और आर्थिक वृद्धि के नजरिए से देख रहे हैं। हालांकि एआई के सकारात्मक पहलू भी सामने आ रहे हैं।
यह तकनीक खेती के लिए बेहतर सलाह देने, एक्स-रे जैसी मेडिकल जांच का तेजी से विश्लेषण करने, जल्दी बीमारी का पता लगाने और मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने में मददगार साबित हो सकती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों और आपदा प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों को भी लाभ मिल सकता है। हालांकि विकसित देशों में भी एआई को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। बड़े एआई डाटा सेंटर भारी मात्रा में बिजली और पानी का उपयोग करते हैं। ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए जीवाश्म ईंधन का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ सकता है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के प्रयास प्रभावित हो सकते हैं।
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